राजेश नरवरिया
कांग्रेस की राजनीति इन दिनों एक पारिवारिक रियलिटी शो जैसी हो चली है, जहाँ कैमरा राहुल गांधी पर लगा है, लेकिन टीआरपी धीरे-धीरे प्रियंका गांधी खींच रही हैं। कहा जाता है कि सोनिया गांधी प्रियंका को आगे लाने से इसलिए कतराती रहीं क्योंकि तुलना का पलड़ा राहुल के लिए भारी पड़ सकता था। अब वही डर सच होता दिख रहा है—और वह भी संसद के लाइव प्रसारण में।
21 साल की राजनीतिक उम्र पूरी कर चुके राहुल गांधी आज भी “एंग्री यंग मैन” की भूमिका में हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि अब न पार्टी को यह रोल पसंद आ रहा है और न ही गठबंधन को। कांग्रेस थक चुकी है और सहयोगी दल दूरी बना रहे हैं। शायद यही वजह है कि पार्टी के भीतर से अब आवाज़ें उठने लगी हैं—और मज़े की बात यह है कि एक मुस्लिम सांसद ने तो सीधे प्रियंका गांधी को नेतृत्व सौंपने और पीएम बनाने की इच्छा जता दी। यह भावना अकेली नहीं है, बल्कि उन नेताओं के चेहरों पर भी पढ़ी जा सकती है जो राहुल की कार्यशैली से वर्षों से “एडजस्ट” करते आ रहे हैं।
लोकसभा का मानसून सत्र प्रियंका गांधी के लिए किसी लॉन्च इवेंट से कम नहीं रहा। उनकी राजनीति का “प्रियदर्शनी संस्करण” ऐसा चला कि कांग्रेस ही नहीं, गठबंधन और यहां तक कि सरकार भी प्रभावित दिखी। नितिन गडकरी से सवाल-जवाब के दौरान जब प्रियंका ने अपने क्षेत्र के मुद्दों पर मिलने की बात कही, तो मंत्री जी का जवाब था—“अपॉइंटमेंट की ज़रूरत नहीं।” राजनीति में इससे बड़ा कॉम्प्लिमेंट क्या होगा?
सत्र के बाद स्पीकर द्वारा बुलाई गई बैठक में प्रधानमंत्री और प्रियंका के बीच जो सहज संवाद दिखा, उसने कई राजनीतिक विश्लेषकों की भौंहें उठा दीं। राहुल गांधी को पीएम या किसी केंद्रीय मंत्री से इस स्तर की सहजता और शिष्टाचार में बात करते देखना तो वैसे भी कल्पना लोक में आता है। प्रियंका की स्वीटनेस और राहुल की एरोगेंट पॉलिटिक्स का फर्क अब HD क्वालिटी में दिखने लगा है।
प्रियंका में इंदिरा गांधी की झलक पहले से देखी जाती रही है।
अंग्रेज़ी पर जबरदस्त पकड़ होने के बावजूद उन्होंने संसद में अपने अहम भाषण हिंदी में दिए—क्योंकि हिंदुस्तान में जननेता बनने के लिए हिंदी बोलना अब भी एक राजनीतिक ज़रूरत है। वंदे मातरम् पर उनकी प्रस्तुति, तर्क और संतुलन—सब कुछ उनकी इमेज को पॉलिश कर रहा है। वायनाड की हल्दी पर पीएम से हुई बातचीत भी इसी सहज राजनीति का उदाहरण थी।
इसके उलट राहुल गांधी ने पीएम मोदी से वैचारिक मतभेद को निजी दुश्मनी का रूप दे दिया है। मोदी सरकार को “वोट चोरी की सरकार” बताने वाले राहुल यह भूल जाते हैं कि जिसे आप वैध ही न मानें, उससे संवाद की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है? विदेश जाकर लोकतंत्र और संविधान पर लेक्चर देना उनकी राजनीति का स्थायी अध्याय बन चुका है—जबकि देश में पार्टी लगातार सिमटती जा रही है।
मां होने के नाते सोनिया गांधी अपने दोनों बच्चों की क्षमताओं से भली-भांति परिचित हैं। विरासत बेटे को सौंपनी थी, इसलिए पहले राहुल आए। सोचा गया था कि युवा नेतृत्व कांग्रेस को नई ऊर्जा देगा, लेकिन नतीजा यह हुआ कि पार्टी अपने सबसे कमजोर दौर में पहुंच गई। गठबंधन की राजनीति में भी कांग्रेस अब मजबूत धुरी नहीं रह गई है। अगर राहुल समय पर फैसले लेते, तो शायद नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा आज किसी और मोड़ पर होती।
प्रियंका अब तक बैक-ऑफिस पॉलिटिक्स में थीं, अब पहली बार सांसद बनी हैं। चमत्कार उन्होंने भी नहीं किए हैं, यह सच है। फर्क सिर्फ इतना है कि राहुल जहां सीधे-सीधे कानूनी उलझनों में फंसे रहते हैं, वहीं प्रियंका खुद भले बेदाग हों, लेकिन रॉबर्ट वाड्रा उनके रास्ते के स्थायी स्पीड ब्रेकर बने हुए हैं।
कांग्रेस से युवा नेताओं का पलायन कोई रहस्य नहीं है। कारण लगभग एक ही—राहुल गांधी का अनिर्णय और उनकी थ्योरी। अब पार्टी को यह समझ आने लगा है कि राहुल की रफ्तार के साथ भविष्य जोड़ना जोखिम भरा हो सकता है। इसलिए बदलाव की छटपटाहट साफ दिख रही है।
इधर प्रियंका धीरे-धीरे अपने पंख खोल रही हैं। राजनीति में आखिरकार वही नेता टिकता है जिसमें जीतने की क्षमता हो। मोदी को राजधर्म सिखाने वाले बहुत थे, लेकिन जनविश्वास जीतने की कला ने उन्हें सत्ता में बनाए रखा।
राहुल गांधी की राजनीति अब हार की ओर जाती दिखती है—सांसद बने रहना ही शायद अंतिम उपलब्धि हो। प्रियंका का उभार और राहुल की गिरावट एक-दूसरे से जुड़ते जा रहे हैं। भाई-बहन की बॉन्डिंग अपनी जगह है, लेकिन राजनीति में भावनाएं नहीं, परिणाम देखे जाते हैं।
कांग्रेस के लिए फैसला आसान नहीं है—क्योंकि यहां सवाल नेतृत्व का नहीं, विरासत बनाम क्षमता का है।