इतिहास की कुछ घटनाएँ सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं, वे भीतर तक उतर जाती हैं। वीर बाल दिवस भी ऐसी ही एक स्मृति है, जो हर वर्ष 26 दिसंबर को देश को दो नन्हे साहिबजादों की अद्भुत वीरता और अडिग आस्था की याद दिलाती है।
यह कहानी है गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे पुत्र — साहिबजादा ज़ोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह — जिनकी उम्र भले ही कम थी, लेकिन साहस किसी अनुभवी योद्धा से कम नहीं था।
युद्ध के बाद बिछड़ा परिवार
आनंदपुर साहिब के संघर्ष के बाद परिस्थितियाँ तेजी से बदलीं। मुगल सेना के हमलों के बीच गुरु गोबिंद सिंह जी का परिवार बिखर गया। बड़े साहिबजादे युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि माता गुजरी जी अपने दो छोटे पोतों के साथ अलग रह गईं।
विश्वासघात के चलते उन्हें सरहिंद पहुँचाया गया, जहाँ सत्ता और क्रूरता का प्रतीक बन चुका था — नवाब वज़ीर खान का दरबार।
दरबार में परीक्षा: धर्म या जीवन
सरहिंद के दरबार में दो नन्हे साहिबजादों को पेश किया गया। नवाब वज़ीर खान ने उम्र का हवाला देते हुए उन्हें लालच और सुरक्षा का प्रस्ताव दिया। शर्त एक ही थी — धर्म परिवर्तन। लेकिन जवाब बेहद स्पष्ट था।
साहिबजादों ने कहा कि वे अपने गुरु और अपने विश्वास से कभी पीछे नहीं हटेंगे। उनका यह साहस दरबार में बैठे लोगों को भी असहज कर गया।
क्रूर निर्णय और अमर साहस
लगातार प्रयासों के बाद भी जब साहिबजादे नहीं झुके, तो सत्ता ने क्रूरता का रास्ता चुना। आदेश हुआ कि दोनों को ज़िंदा दीवार में चुनवा दिया जाए।
ईंटें चढ़ती गईं, ठंड बढ़ती गई, लेकिन बच्चों की आस्था और साहस अडिग रहे। इतिहास गवाह है कि उन्होंने अंतिम क्षण तक डर को अपने पास फटकने नहीं दिया।
माता गुजरी की मौन शहादत
उसी ठंडी बुर्ज में माता गुजरी जी ने अपने पोतों के बलिदान का समाचार सुना। यह पीड़ा उनके लिए असहनीय थी। कुछ ही समय बाद उन्होंने भी इस संसार को त्याग दिया। उनका बलिदान भी इस कथा का अविभाज्य हिस्सा बन गया।
क्यों मनाया जाता है वीर बाल दिवस
साहिबजादों की शहादत केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, आत्मसम्मान और साहस की प्रतीक है। इसी भावना को जीवित रखने के लिए भारत सरकार ने 26 दिसंबर को ‘वीर बाल दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की।
इस दिन का उद्देश्य देश के बच्चों और युवाओं को यह समझाना है कि साहस उम्र का मोहताज नहीं होता और सत्य के लिए खड़ा होना ही सबसे बड़ा बल है।
आज के भारत के लिए संदेश
वीर बाल दिवस केवल अतीत को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि वर्तमान और भविष्य को दिशा देने का अवसर है। साहिबजादों की कहानी आज भी सिखाती है कि जब विचार मजबूत हों, तो सबसे बड़ा भय भी हार मान लेता है।