1971 की फ़िल्म हरे रामा हरे कृष्णा ने बॉलीवुड को एक ऐसा गाना दिया, जिसने न सिर्फ़ संगीत की दिशा बदली, बल्कि सरकारी सेंसरशिप को भी चुनौती दी—‘दम मारो दम’।
देव आनंद द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म में ज़ीनत अमान का किरदार हिप्पी कल्चर से जुड़ा था, और आशा भोसले की आवाज़ में यह गाना उस दौर की बगावत और आज़ादी का प्रतीक बन गया।

लेकिन जब यह गाना पहली बार आकाशवाणी और दूरदर्शन के पास पहुँचा, तो उसे “हिप्पी संस्कृति को बढ़ावा देने वाला” कहकर बैन कर दिया गया। सरकार को लगा कि यह गाना युवाओं को भटकाने वाला है।
दिलचस्प बात यह है कि ‘दम मारो दम’ को शुरुआत में सिर्फ़ एक इंट्रो ट्रैक माना गया था, लेकिन इसकी धुन, बोल और ज़ीनत अमान की स्क्रीन प्रेज़ेंस ने इसे एक कल्ट क्लासिक बना दिया।
बैन के बावजूद यह गाना इतना लोकप्रिय हुआ कि पार्टियों, कॉलेजों और रेडियो पर इसकी धुन गूंजने लगी। आशा भोसले को इस गाने के लिए फ़िल्मफेयर अवॉर्ड मिला, और ज़ीनत अमान को बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का सम्मान।
आज, 50 साल बाद भी ‘दम मारो दम’ न सिर्फ़ एक गाना है, बल्कि एक दौर की पहचान है—जहाँ संगीत ने सिस्टम से टकराना सीखा।