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भारत सीमा पर असीम मुनीर की सख्ती: डर की तैयारी या ताकत का प्रदर्शन?

By · December 14, 2025 · 11:23 am · 10 min read

पाकिस्तान के पहले चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर का भारत-पाकिस्तान सीमा के पास पहुंचना कोई सामान्य सैन्य दौरा नहीं था। यह एक संदेश था—ज़मीन पर कम, मनोवैज्ञानिक मोर्चे पर ज़्यादा।

गुजरांवाला और सियालकोट जैसे संवेदनशील इलाकों में खड़े होकर असीम मुनीर ने जिस तरह “पूरी तैयारी” और “हर खतरे से निपटने” की बात की, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है—क्या पाकिस्तान वाकई किसी खतरे से घबराया हुआ है, या फिर खुद माहौल को गर्म रखना चाहता है?

जब बयान सीमा पर दिए जाएं, तो अर्थ बदल जाते हैं

सेना प्रमुखों के बयान अगर सैन्य मुख्यालयों में दिए जाएं, तो वह रूटीन माने जाते हैं। लेकिन जब वही बातें भारत सीमा के ठीक पास खड़े होकर कही जाएं, तो उन्हें केवल ‘आंतरिक संवाद’ नहीं कहा जा सकता। यह सीधे तौर पर भारत को संकेत और घरेलू जनता के लिए सख्त छवि गढ़ने की कोशिश है।

असीम मुनीर ने “हाइब्रिड वॉर”, “आंतरिक दुश्मन” और “बाहरी ताकतों” की बात की—लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि असली खतरा कौन है। विश्लेषकों का मानना है कि यह अस्पष्टता ही पाकिस्तान की रणनीति का हिस्सा है, ताकि हर विफलता का ठीकरा किसी ‘बाहरी साजिश’ पर फोड़ा जा सके।

पाकिस्तान की अंदरूनी बेचैनी और सीमा पर सख्ती

यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब पाकिस्तान आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और आंतरिक सुरक्षा समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे हालात में सीमा पर सख्त बयान देना नई बात नहीं है। इतिहास गवाह है कि जब भी पाकिस्तान के भीतर हालात बिगड़ते हैं, भारत विरोधी सुर तेज हो जाते हैं।

अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद भारत की जवाबी कार्रवाई ने पाकिस्तान की रणनीतिक चिंता को और बढ़ा दिया था। असीम मुनीर का यह दौरा उसी बेचैनी की झलक माना जा रहा है।

CDF पद: सुधार या सत्ता का केंद्रीकरण?

असीम मुनीर का CDF बनना पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था में बड़ा बदलाव जरूर है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह संस्थागत सुधार है या सत्ता का और अधिक सैन्य केंद्रीकरण? सेना, नौसेना और वायुसेना की कमान एक ही हाथ में देना, पाकिस्तान जैसे लोकतांत्रिक रूप से कमजोर देश में, चिंता का विषय भी है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मॉडल भारत के CDS सिस्टम की नकल जरूर है, लेकिन वहां जहां नागरिक नियंत्रण मजबूत है, और पाकिस्तान में जहां सेना पहले से ही राजनीति पर हावी रही है—दोनों की तुलना आसान नहीं।

भारत के लिए क्या संकेत?

भारत के लिए असीम मुनीर का यह संदेश नया नहीं है। सीमा पर बयानबाज़ी, सैन्य दौरे और ‘तैयारी’ की बातें पाकिस्तान की पुरानी रणनीति रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह सब CDF जैसे नए पद की आड़ में किया जा रहा है।

भारत की रणनीति अब बयान सुनने की नहीं, बल्कि क्षमता और जवाबी तैयारी दिखाने की है—और यही बात शायद पाकिस्तान को सबसे ज़्यादा परेशान कर रही है।

भारत सीमा पर असीम मुनीर की मौजूदगी शक्ति का प्रदर्शन कम और डर का प्रबंधन ज़्यादा लगती है। यह दौरा जितना भारत के लिए संदेश था, उससे कहीं ज़्यादा पाकिस्तान की घरेलू राजनीति और सैन्य प्रभुत्व को मजबूत करने की कवायद दिखाई देता है।

दक्षिण एशिया में शांति की राह आज भी वही है—कम बयान, कम प्रदर्शन और ज़्यादा जिम्मेदारी। लेकिन फिलहाल पाकिस्तान की रणनीति इससे उलट नजर आ रही है।

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