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अरावली पर्वतमाला पर विवाद: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उठी चिंता, ‘सेव अरावली’ अभियान तेज

By · December 23, 2025 · 12:51 pm · 8 min read

देश की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में शामिल अरावली एक बार फिर चर्चा में है। यह पर्वत शृंखला उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरण, भूजल संरक्षण और जलवायु संतुलन की रीढ़ मानी जाती है, लेकिन हालिया न्यायिक फैसले के बाद इसके संरक्षण को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में अरावली पर्वतमाला की पहचान और परिभाषा से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत मानदंडों को स्वीकार किया गया। इन मानदंडों के अनुसार अब केवल वही भू-भाग ‘अरावली पहाड़ी’ माने जाएंगे, जिनकी ऊँचाई आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक है।

क्यों बढ़ी चिंता?
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली सिर्फ ऊँची पहाड़ियों तक सीमित नहीं है। इसकी छोटी पहाड़ियाँ, ढलानें और चट्टानी क्षेत्र भी पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का अहम हिस्सा हैं। नई परिभाषा लागू होने से बड़ी संख्या में क्षेत्र कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकते हैं, जिससे खनन, रियल एस्टेट और औद्योगिक गतिविधियों का दबाव बढ़ने की आशंका है।

विशेषज्ञों के मुताबिक यदि अरावली के कम ऊँचाई वाले हिस्से भी असुरक्षित हुए, तो इसके परिणाम दूरगामी हो सकते हैं। इससे मरुस्थलीकरण तेज़ हो सकता है, भूजल स्तर और गिर सकता है और दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में वायु प्रदूषण की समस्या और गंभीर हो सकती है।

‘सेव अरावली’ की गूंज
फैसले के बाद देश के कई हिस्सों में नागरिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने ‘सेव अरावली’ अभियान तेज कर दिया है। सोशल मीडिया से लेकर ज़मीनी स्तर तक पहाड़ियों को बचाने की मांग उठ रही है। कई स्थानों पर लोगों ने इसे सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा मुद्दा बताया है।

राजनीति भी हुई सक्रिय
अरावली का मुद्दा अब सियासी रंग भी लेने लगा है। विपक्षी दलों ने सरकार पर पर्यावरण संरक्षण के साथ समझौता करने के आरोप लगाए हैं, जबकि सत्तापक्ष का कहना है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है। इस बहस ने अरावली को राजनीति के केंद्र में ला दिया है।

आगे क्या रास्ता?
विशेषज्ञों की राय है कि अरावली के संरक्षण के लिए केवल ऊँचाई आधारित परिभाषा पर्याप्त नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि पूरे पारिस्थितिक क्षेत्र को एक इकाई मानकर संरक्षण नीति बनाई जाए। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो अरावली का क्षरण आने वाले वर्षों में गंभीर पर्यावरणीय संकट को जन्म दे सकता है।

अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं, बल्कि उत्तर भारत की पर्यावरणीय ढाल है — और इसे बचाना सामूहिक जिम्मेदारी है।

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